लाली एक मासूम की कहानी

लाली एक मासूम की कहानी

नमस्कार दोस्तो,
ये कहानी लाली कि है जिसकी मा जब वो चोटी होती है तब आत्मदाह कर लेती है नन्ही सी जान पर बहुत सारा बोझ आ गया था। दादा जी जो कि लकवा से ग्रसित अपने खटिया ने सोए रहते और दादी कैंसर से पीड़ित वो भी दूसरे खटिया में सोती रहती थी तो दोस्तो आगे की कहानी शुरू करते है।


आग आग ...आग......चारों तरफ आग की खबर आग की तरह फैल गई ! सभी ने आग वाले कमरे को घेर लिया । जैसा कि हर बार होता है कोलाहल , शोरशराबा ज्यादा और बचाव का कार्य कम हो रहा था।

 हर कोई बचाओ बचाओ ..चिल्ला रहा था मगर ..बचाव को कोई आगे नहीं आ रहा था। तभी आग में से एक अधझुलसी मासूम बाहर आती है जिसे एक बुढ़िया सीने से यह कहते हुए चिपका लेती है लाली मेरी ला...ली.....न ...हीं ...।

परिणाम

 लेकिन वह  लड़की हाथ छुड़ाकर माँ माँ पुकारते हुए फिर से दहकती आग में चली जाती है तभी आग में से दो जलते हाथ लड़की के सीने और गले पर चिपक जाते हैं और लाली को जोर से धकियाकर आग से बाहर कर देते हैं। लोग जलते हाथों को देखकर और दहशत में आ गए ,कुछ तो भाग छूटे ...कुछ बचाने के लिए प्रयास करने लगे।

 लाली के बाहर आते ही बाकी का काम खड़े लोगों ने कर दिया लाली को कंबल में लपेटकर जकड़ लिया गया , लाली बार बार माँ ....माँ.....चिल्लाते चिल्लाते बेहोश हो गई । उसे उसके दादा के पास लिटा दिया गया जो बाहर दूर टूटी हुई खाट पर पड़ा है। 

 आग अपनी भयावह लपटों से पूरे घर को घेर रही थी ...यूँ तो घर कहने को केवल एक कमरा और एक बरामदा मात्र ही था जो अब पूरी तरह आग की लपटों की गिरफ्त में आ चुका था। अब उसके पास जाना अपनी मौत को निमन्त्रण देने से कम न था।

आनंदी

 पानी फेंका जा रहा था , रेत वगैरह जो भी हाथ लगता लोग उसे आग के हवाले करते जा रहे थे। कुछ समय पश्चात आग शांत हुई तो सिर्फ़ रूदन का स्वर सुनाई दे रहा था ...पुलिस आ चुकी थी और एक झुलसे हुए कंकाल को अपने कब्जे में लेकर पूछताछ कर रही थी। लोग बतिया रहे थे शव दाह की भी आवश्यकता नहीं है आत्म दाह जो हो गया था।



यह हादसा हुआ था तब लाली की उम्र महज तीन साल की थी आज वह आठ बरस की हो गई अब जब भी लाली चूल्हा जलाती या आग देखती तो उसमें माँ का आत्म दाह जीवन्त हो उठता है , वह स्वयं को कोसती रहती है क्यों उस दिन माँ ने मुझे भी अपने साथ नहीं जलने दिया। खुद चली गई मुझे इस नर्क में धकेल कर ....यह सोचकर उसका हाथ अनायास ही अपने सीने व गले पर चला गया जहाँ अभी भी जले हाथों के निशान ज्यों के त्यों बने हुए हैं।

वह सजृन कार भी कभी -कभी ऐसा सजृन कर देता है कि मन विद्रोही हो उठता है। उस सृष्टि कार के मन में कब क्या नूतन गढ़ने का मन बन जाए कह नहीं सकते मगर कभी कभी वह भी बड़ी चूक कर देता है। महज आठ  साल की मासूम जिसे ठीक से अपने जीवन की उमंग का भी अहसास नहीं वह अधजले हाथों से छपाछप , पकी- पकी रोटियाँ सेंक रही है। 

कागज का विमान


हा ! रे निष्ठुर विधाता क्या तुम्हें तनिक भी दया नहीं आ रही यह सब तुम किन नेत्रों से देखते हो ? सोचकर हैरान हूँ। शिशुपन में माँ से बिछोह दुनिया का सबसे भयानक अहसास है , मैं सोचता हूँ इससे बड़ा हादसा जीवन में और कोई नहीं हो सकता। 

जब अनुभव की स्लेट पर बचपन की यादें उकेरी जाती है , कुछ सुनहरे भविष्य के सपनें , मृदुल हास रंगा जाता है। ऐसे में यदि टीस , पीड़ा , अभाव रंग दिए जाएं तो रंगकर्मी के प्रति क्रोध जायज है। परन्तु वह अबोध इन सबसे परे है। 

 उसके चेहरे पर कहीं वेदना नहीं , कहीं शिकन नहीं , वह नन्हें नन्हें नाजुक हाथों से आटे को गूँथ रही है , ताकि रोटियाँ बनाई जा सके , जैसे कोई कुम्हार माटी को रोंदता है एक नया कलश बनाने के लिए । 

सावन के सोमवार

पास ही दादा का बेजान जिस्म पड़ा है। चौंकिए मत जी हाँ बेजान जिस्म ...

दादा को लकवा मार गया ....वो सिर्फ़ बेजान मिट्टी का पुतला भर जो एक टक अंबर में न जाने क्या ताकता रहता है। 

उसे नित्यकर्म के लिए भी सहारे की जरूरत पड़ती है। क्या विधान है विधाता का पास ही दादी जो कि कैंसर से पीड़ित है एक और चारपाई पर लेटी है। दोनों ही अकाल मृत्यु का इन्तजार करते हुए मरणासन्न पड़े है। 

सबसे हृदय विदारक बात जिसे सुनकर मैं धरती को भी इस असहनीय बोझ का भागी मानता हूँ वह यह कि इस नन्हीं जान की माँ आत्मदाह कर इसे अभागन होने का तमगा दे गई।

 वह यह भी न सोच पाई कि मेरे बाद इस अंश का क्या होगा जिसे मैंने नौ माह तक अपने गर्भ में पाला था। ये धरा उसका भी भार नहीं सह सकी । उस माँ ने आत्म दाह सिर्फ़ सास ससुर की सेवा से बचने के लिए किया होगा यह बात नारित्व को चेतावनी देती है।

अनोखा विवाह

 मुझे चिंतन के लिए विवश भी करती है जिस नारी को धरती सम धर्यवान मानते हैं ,जिसे ममता का सागर , दया , त्याग करूणा की प्रतिमूर्ति मानते हैं वह ऐसा कठोर कदम उठा लेगी मन यह सब सोचकर ही आतंकित हो उठता है।

 नहीं कोई और वजह रही होगी इसके मूल में , परन्तु अभी इसी पर विश्वास करना पड़ेगा क्योंकि यह सत्य है। अब लाली माँ को कोसती रहती है। अपनी लाली को खोकर निस्तेज होती जा रही है।

घर में उसके पापा ही शेष है जो घर की धुरी है जिस पर यह घर चल रहा है। सुबह प्रभात की किरणों के साथ निकल पड़ते हैं जो कि देर रात ढ़ले घर लौटते हैं। अनपढ़ होने का अभिशाप उन्हें विरासत में मिला हुआ है। वे एक फैक्ट्री में मजदूर है शाम को लौटते समय शराबी होने का भी सौभाग्य उन्हें प्राप्त हो गया है। 

दिनभर इन दो वृद्धों की सेवा के लिए यह आठ साल का जीव जो ठीक से मुस्कुरा भी नहीं पाया है , बस लगा हुआ है टेढ़ी - मेढ़ी रोटियाँ बनाने में जैसे गढ़ रहा हे सपनों की नई दुनिया । बातों में अपना जिक्र सुनकर वह  सिर्फ़ नजर उठाकर देखती भर है कोई बात नहीं करती , न कोई प्रत्युत्तर ही देती है। 

अच्छे संस्कार

लाली से मिलकर मैं इस हादसे का बहुत हद तक स्वयं को जिम्मेदार मानता हूँ , एक शिक्षक होकर हम समाज को क्या दिशा दे पा रहे हैं सोचकर मन द्रवित हो गया ।मन में आया कि यदि मैं ब्रह्मा होता तो तुरन्त इसके भाग्य मैं अपने हिस्से के सारे सुख लिख देता और इसके दुख अपने भाग्य में लिख लेता , मगर ऐसा कहाँ सम्भव है।

 सबको अपने अपने हिस्से का सुख और दुख भोगना पड़ेगा। यही सृष्टि का नियम है हाँ ..., उसका दुख बाँटने में हर संभव मदद करूँगा। मन यह निश्चय कर पुनः लौट आया लाली को रोटियाँ बनाते देख लगा कि जैसे सब कुछ उसी के लिए बना है।

 आँखों में एक स्थाई नमी है जो इस बात का प्रमाण है यह बहने बाली गंगा नित्यवाही है और यहीं से इसका उद्भव होता है जो इसके अरुणाभा युक्त कपोल प्रदेश को सिंचित करते हुए अनवरत प्रवाहित होती है। लगातार प्रवाह के कारण मैले चेहरे पर कुछ उज्ज्वलता लेकर बने हुए सुर्ख निशान इसकी पुष्टि करते हैं। 

पांखी एक बेटी की कहानी

रोटियाँ सेंकते हुए कई बार जलते अंगारों का स्पर्श पाकर हाथ को झटककर मुहँ से सिसकारी- सी निकालती है। और उसे ठण्ड़ा करने के लिए व्यर्थ फूँक भी मारती है। फिर पुन: लग जाती है रोटियाँ बेलने में ....पास ही उसकी ताई बैठी हैं जो स्पष्टीकरण दे रही हैं कि ये लोग जिद्दी हैं हमारे साथ नहीं रहना चाहते हैं। हम कई बार इन्हें लेने आ चुके ....क्यों लाली ...सही कह रही हूँ ना मैं ...? 

लाली हाँ में गर्दन हिलाते हुए झूठी हँसी हँस देती है। यही उसका विरोध करने का तरीका है। जिसकी वक्र आश्य मेरा मन खूब समझ गया । और शायद लाली की माँ के आत्मदाह का मूल भी यहीं कहीं जान पड़ता है।

बातचीत और बढ़ती है ताई बताती है भैया यह लड़की अभागन है , डायन है अपनी माँ को खा गई ...नहीं तो जलती आग से कैसे जिन्दा बच जाती ...मेरी देवरानी तो नहीं बच पाई ।

चम्पा एक बेटी की दास्तां

 जरूर पिछले जन्म की पापिन है जिसे कष्ट भोगने के लिए भगवान ने यहाँ भेज दिया है। मुझसे अब रहा नहीं कहा मैं कह उठा ...भगवान के लिए ऐसी अशुभ बातें तो मत करो । ये सब अंधविश्वास हैं।

 मैं यह सब नहीं मानता इसमें इस बच्ची का कोई दोष नहीं है। मन खिन्न हो उठा । मैं वहाँ से भारी मन से उठ कर गया । ताई ही नहीं पूरा परिवार उस मासूम को अभागन मानता है। और यह उनके घर का निजी मामला है।बाहरी हस्तक्षेप उन्हें पसंद नहीं सिवाय सांत्वन के।

लौटते समय सोचकर मन दंग रह गया। क्या कसूर है उस नन्ही जान का जिसकी नाजुक हथेलियों में अभी भाग्य की रेखाएँ बनने भी नहीं लगी वह कैसे भाग्यहीन हो सकती है। 

वह कैसे अभागन हो सकती है जो चार चार प्राणियों का पेट भर रही है , दिन रात कड़ी मेहनत कर सेवा कर रही है। 

बेटी हो तो ऐसी

 क्या ये अंधविश्वास हमें इस हद तक गिरा देगें ? कि हम मानवता के धर्म को भी भूल जाएगें ?  

जिस मासूम को इस बचपन में माँ के आँचल की छाँव चाहिए ...प्यार चाहिए वह जीवन की ऐसी कठिन परीक्षा क्यों दे ? 

क्यों आखिर क्यों ? 

बार बार मेरे सामने लाली का निस्तेज चेहरा धूम रहा है और गूँज रही है ताई की आवाज...ओ..ला..ली .....!

तो दोस्तो आपको ये कहानी कैसी लगी अगर अच्छी लगे तो कमेंट करे और शेयर करे।

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