अच्छे संस्कार

नमस्कार दोस्तो,
तो दोस्तो आज की कहानी है शर्मिला की जो अपने बच्चे ओर पति के साथ शहर में रहती है। और गांव में इनका घर है जो कभी कभी शर्मिला आकर ध्यान देती है। गांव में जब वो काकी के पास बैठी तो उनकी खैरियत पुची काकी बोली कि लडके तो यूहीं पल जाया करते है तो दोस्तो आज की अपनी कहानी शुरू करते है

अच्छे संस्कार 

"नमस्ते काकी", शर्मिला ने सर झुका कर कहा।

"अरे बहु। बहुत खुश रहो।आज कैसे आना हुआ ? कितने दिनो के लिये आयी हो ?", पडौस वाली काकी ने पूछा।

"बस काकी दो दिन हुए। वापस निकल रही हूँ । रवि को अकेला उसके पापा के पास छोड़कर आयी थी ना", शर्मिला ने पास पड़े मूड़े पर बैठते हुए बोला।

समाज की जिम्मेदारी

"अरे वो तो बड़ा हो गया होगा ना अब", काकी ने आश्चर्य से पूछा।

"हाँ काकी बस 15 मे लगा है बीते माह", शर्मिला ने पानी का घूंट भरते हुए बोला।

"अरे तू तो गंगा नहा गयी बहू। लड़को की जिम्मेदारी वैसे भी ना होती। लड़के तो यूँ ही पल जाया करें। बिटिया होती तो भारी जिम्मेदारी होती। पान्च पान्च ब्याह ली हमने", काकी ने बड़े गर्व से कहा।

सुन्कर शर्मिला मुस्कराई, "अब कोई ऐसे ना पलता काकी और विशेषकर लड़के तो। खैर आप बैठो। फिर मिलती हूँ। ख्याल रखना अपना काकी"।

कहकर शर्मिला काकी को प्रणाम कर पैदल बस स्टैंड की तरफ निकल पड़ी।

पौनी अगर ऐसा करती तो

शर्मिला शहर मे अपने पति और एक बेटे के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही थी। उसके माँ बाप का देहांत कुछ बरस पहले ही हुआ था। उनकी अकेली सन्तान होने के कारण उसके माता पिता के गावँ वाले घर और बचे कुचे समान की जिम्मेदारी का भार अब उसी पर था। कभी कबार समय निकाल कर शर्मिला गाँव आ जाया करती थी सब देखने और व्यवस्थित करने।

"अरे दीदी! प्रणाम। और सब कुशल मंगल", सामने से शर्मिला जी को आते हुए देख हरि ने पूछा।

शर्मिला जी ने रुक कर जवाब दिया, "हाँ हरि भैया सब ठीक है। तुम बताओ घर परिवार सब कैसा है"।

"सब बड़िया है दीदी तुम्हारी दुआ से। आज ही सुबह तुम्हारी बात हो रही थी। बिटिया की चिन्ता है बस। बड़ी हो गयी है। कोई शहर का रिश्ता बताओ इस्के लिये और ये बेटा लोग तो ऐसे ही पल जाएँगे"

सास बहू का प्यार

"शहर का क्यूँ। यहीं ढूंड लो गाँव मे कोई", शर्मिला ने घड़ी देखते हुए कहा।

"दीदी बस दस मिनट बैठो। तुम्हारी बस मे अभी समय है" खाट ख्सिकाते हुए हरि बोला।

"अरे दीदी क्या बताये। गाँव भर के लड़के सब आवारा किस्म के हैं। कोई समझ नही आता। कोई शहरी ही बताओ", हरि ने उत्सुकता से बोला।

"आवरा तो होंगे ही। गाँव भर मे लहर जो चली हुई है कि बेटा अपने आप पल जायेगा और लडकियों के साथ ज्यादा सोच्ना पड़ता है", शर्मिला ने गुस्से मे बोला।

पांखी एक बेटी की कहानी

"अरे और क्या दीदी सही बात तो है। बिटिया की चिंता रहती है। अकेले कहीं नही जाने देते। आजकल बड़ा माहौल खराब हो गया है यहाँ का भी। ये सब पाश्चात्य सभ्यता का असर है। इन लड़कों का क्या है। कहीं भी आयें जायें। मस्त रेहते हैं और खाते पीते खेल्ते बड़े हुए जा रहे हैं। इन्हे किसका डर है", हरि ने हस्ते हुए कहा।

"वो तो ठीक है पर ये क्या खाते पीते हैं ये भी तो देखना जरुरी है ना", शर्मिला ने कहा।

"अरे क्या फरक पड़ता है दीदी। लड़को के एब कोई नही देखता। और लड़की का चारित्र सब देख्ते हैं", अब हरि ने अपनी बात पर जोर दे कर बोला।

"ये। ये बेटा है ना तुम्हारा ?", क्रोध के स्वर मे शर्मिला ने पूछा।

चम्पा एक बेटी की दास्तां

"हाँ दीदी क्या हुआ ?", हरि सकपका गया।

"फिर तो मै कहूँगी तुम्हे बेटी से ज्यादा बेटे को घर मे कैद करके रखने की अवश्यकता है। समाज को इससे नुक्सान है बेटी से नही। दो दिन पेहले आते समय इसने मुझे भी गांव के नुक्कड़ पर छेड़ने की कोशिश की थी। पेहले गलती तुम्हारी है, पाश्चात्य सभ्यता कहाँ से बीच मे आ गयी जब नीव ही गलत रखी जा रही है।

 अपने बेटे की दिनचर्या पर तुम्हारा कोई विशेष ध्यान ही नही है। समस्त ध्यान तुम लोगो ने बेटी को घर मे बन्द करके रखने मे लगाया है। अरे थोड़ा ध्यान इन लड़कों को सही रास्ता दिखने मे लगाते तो पूरे गांव की तस्वीर अलग होती और यहीं गांव मे कोई शरीफ लड्का भी मिल गया होता बेटी के लिये।"

"पूरे गांव की सिर्फ यही रट है कि बेटे की माँ की कोई जिम्मेदारी नही होती है। अरे मै कहती हुँ दुगनी जिम्मेदारी है। पूरे समाज की जिम्मेदारी ही तो बेटे की माँ के कंधे पर होती है।

बेटी हो तो ऐसी

 एक माँ के उपर उसके बेटे के साथ साथ घर के बाहर तुम्हारी बेटी जैसी कन्याओं के साथ वो क्या करते हैं, उसकी भी जिम्मेदारी होती है। सिर्फ बेटा है तो उसे ऐसे ही समाज मे खुले साँड़ की तरह छोड़ दो। ये मानसिकता बिल्कुल गलत है"।

"अपनी बेटी को अच्छे संस्कार देने पर वो अपना और अपने परिवार का मान बढ़ाती है परंतु एक बेटे को अच्छे संस्कार देने से आप पूरे समाज यानि गांव का मान बढ़ाते हो। याद रखो अगर तुम्हारा बेटा गलत काम करके घर आए तो उसपे पाबंदी लगाओ न कि अपनी बेटियों को घर मे कैद कर लो"।

"चलो अब मैं चल्ती हूँ । आगे से बेटे के भी देर से घर आने का कारण और देर रात बाहर रेहने का भी कारण जरुर जान लेना", कहकर शर्मिला चारपाई से उठकर जाने लगी।

पापा की नन्ही परी

"दीदी इसकी तरफ से मैं माफी माँगता हूँ । मैं वाकई में शर्मीन्दा हूँ।कहीं तो गलती हमसे भी हुई है। मैं आगे से आपकी बात का ख्याल रखून्गा। परंतु सिर्फ हमारे ख्याल रखने से क्या होगा दीदी ? ", हरि ने सर झुका कर पूछा।

"बदलाव है भैया, शताब्दी एक्सप्रेस नहीं। धीमे धीमे ही आयेगा। तुम ही शुरुआत कर लो", बिना मुड़े इतना कहकर शर्मिला बस स्टैंड की तरफ तेजी से निकल गयी।

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