समाज की जिम्मेदारी

नमस्कार दोस्तो,
दोस्तो आज की कहानी तुषार और अभय की है जो परीक्षा ख़तम होने के बाद एक होटल में नाश्ता करने आते है वहा भीड़ देख कर एक बुजुर्ग से पूछते है भीड़ का कारण तो वो बताते है की कुछ दिन पहले ट्रेन में कुछ लोगो ने  लडकी का बलात्कार कर उसे ट्रेन से फेक दिया था तो आज टीवी में बता रहे है कि को लड़की मर गई।दोोोोोो
तो दोस्तो आज की कहानी शुरू करते है।

समाज की जिम्मेदारी

तुषार और अभय जैसे ही चाय की दुकान पर पहुँचें, वहाँ की भीड़ को देखकर चौक गए। सभी की नज़र टेलिविज़न की तरफ़ गड़ी थी। तुषार और अभय को समझ नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है ! पूरे सप्ताह परीक्षा में व्यस्त रहने के बाद आज उन्हें बाहर निकलने का मौक़ा मिला था।

फिर तुषार ने कहा- आ जा काउन्टर पर पूछते हैं, क्या हुआ है ? तुषार ने काउन्टर पर बैठे बुज़ुर्ग आदमी से पूछा, क्या हुआ है ? इतनी भीड़ क्यों लगी है ? लेकिन अभय बात को काटते हुए कहा- आप पहले मेरा आडर ले लो।

  बहुत भूख लगी है। वैसे भी सप्ताह भर से मेस का खाना खा खाकर थक गया हूँ और वो फिर से मोबाइल में लग गया। ऑर्डर लेने के बाद बाद उस बुज़ुर्ग इंसान ने तुषार की तरफ़ देखते हुए मायूसी से जबाब दिया- पिछले सप्ताह फिर से समाज के कुछ अनैनित मानसिकता के लोगों ने हमारे देश की बेटी को शर्मशार किया था और उसके बाद उसे चलते ट्रेन के नीचे फेंक दिया था। उस लड़की को जैसे तैसे वहाँ से गुज़र रहे राहगीरों ने अस्पताल पहुँचाया था। थोड़ी देर पहले उसकी मौत हो गई है।

पौनी अगर ऐसा करती तो

फिर उन्होंने ख़ुद को संभालते हुए कहा- ये समाचार तो एक सप्ताह से पूरे चैनल पर छाई है, तुम्हें कैसे नहीं पता !

तुषार ने कहा- हम पूरे सप्ताह परीक्षा में व्यस्त थे तो हमें पता ही नहीं चला। वैसे आजकल तो ये सब आम बात हो गई है। हर दूसरे दिन ऐसी एक ना एक ख़बर आ ही जाती है। क्या करे कोई !

उस बुज़ुर्ग इंसान ने कहा- क्यों, तुम तो युवा वर्ग हो। आने वाले समाज की ज़िम्मेदारी है तुम्हारे उपर और तुम लोग तो वक़ील बनने की पढ़ाई भी कर रहे हो। तुम सब समाज को बदलने की नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेगा।

पांखी एक बेटी की कहानी

तभी अभय जो इन सब बातों के परे तब से अपने मोबाइल में लगा था और अपने नाश्ते का इंतज़ार कर रहा था कहा- हम वक़ील बनने वाले हैं, समाज सुधारक नहीं।पहले हम अपने नौकरी करियर के बारे में सोचें कि इसी में समय बर्बाद करते रहे कि कौन क्या कर रहा।

 इन सब के लिए सरकार को ठोस क़दम उठाने चाहिए।दूसरे देशों में तो लोगों की इतनी हिम्मत नहीं होती क्योंकि वहाँ के सख़्त नियम है। यहाँ तो ना नियम है और ना ही उनका किसी को डर है और हर वक्त आप लोग हमारे जेनेरेसन को क्यों दोष देते हो। आप लोगों की ज़िम्मेदारी नहीं बनती क्या इन सब के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए।

उस बुज़ुर्ग इंसान ने कहा- अरे बेटा ग़ुस्सा क्यों होते हो, मैं तो बस समझाने की कोशिश कर रहा था। दुख होता है यह सब देखकर। हमारे समय में तो बहू-बेटियों को कोई ग़लत नज़र से भी नहीं देखता था।

चम्पा एक बेटी की दास्तां

तभी तुषार ने बीच बचाव करते हुए कहा- अरे अंकल इसकी बात का बुरा मत मानना। इसे बस ज़ोरों की भूख लगी है इसीलिए ये ऐसे बोल रहा। आप जल्दी से समोसे भिजवा दो। ऐसा बोलकर वह दोनों पास की टेबल पर बैठने चले गए।

टेबल पर बैठने के बाद भी अभय का ग़ुस्सा शांत नहीं हुआ। जब देखो युव वर्ग युवा वर्ग। हमें और कोई काम नहीं क्या।

तुषार ने अभय को शांत होने के लिए कहा। तभी चाय भी आ गई। दोनों बातों को किनारे कर समोसे खाने लगे और अभय मोबाइल में तुषार को कुछ दिखाने लगा।

बेटी हो तो ऐसी

तभी पास बैठी दो लड़कियाँ जो काफ़ी देर से उनकी बात सुन रही थी उनसे रहा नहीं गया और वो उनके पास गई अपना परिचय दिया और कहा, क्या हम आपसे थोड़ी देर बात कर सकते हैं। दोनों ने बड़े उत्सुकता से उन्हें बैठने के लिए कहा।

फिर उसमें से एक लड़की ने कहा, आपको उस अंकल की बात सुनकर इतना ग़ुस्सा क्यों आया। तुरन्त ही अभय ने अपना भाव बदलते हुए कहा तो आप उस बारे में बात करने आई है। मुझे सबसे ज्ञान नहीं चाहिए और आप लोगों से तो बिलकुल भी नहीं। आप जा सकती है और हाँ ,दुनिया में क्या हो रहा उन सबकी ज़िम्मेदारी मेरी नहीं और मैंने आवाज़ उठा भी दी तो कौन सुन रहा मेरी।

आप आवाज़ उठाकर तो देखिए। आपकी कोई नहीं सुनेगा इस कारण आप आवाज़ नहीं उठाते। ऐसा इसलिए है क्योंकि आप किसी की नहीं सुनते। आपने सही कहा- आपके पास अपने बहुत से काम है, ज़िम्मेदारियाँ है, आप समाज सेवा नहीं कर सकते लेकिन जिस समाज में आप रहते हैं, जिसके कारण आप अपने सारे ख़्वाब पूरे करते हो,उसके लिए हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी तो बनती है।

एक लडकी सांवली

 जिसके साथ हुआ वो जाने ये कहकर अगर हम पल्ला झाड़े तो कल को आपका या आपके किसी क़रीबी के साथ कुछ हादसा हो जाए तो क्या हो अगर चिकित्सक पुलिस वाहन चालक, नर्स और अन्य लोग जिनकी आपको उस समय ज़रूरत हैं वो पल्ला झाड़ ले।

उस लड़की की बात का अभय के पास कोई जबाब नहीं था।

जाते जाते उस लड़की ने कहा -वैसे आप मोबाईल पर बैठे-बैठे कुछ बुराइयों को रोक सकते हैं।

अभय ने कहा- वो कैसे ?

आप और आपके दोस्त या बहुत सारे ऐसे लोग जो लड़कियों की उलटी सीधी तस्वीरें, विडियो दिन भर देखते हैं, पसन्द करते हैं, एक दूसरे के साथ साझा करते हैं, क्या कभी आपको लगता है कि उस विडियो को किसी लड़की ने मजबूरी में बनवाया हो या उसे बिना पता चले उसकी ऐसी तस्वीर खींच ली गई हो।

पापा की नन्ही परी

 मगर आपको क्या फ़र्क़ पड़ता है आप तो अपनी मस्ती में शेयर कर रहे साझा कर रहे और इसकी वजह से कोई लड़की आत्महत्या करे तो आपकी ज़िम्मेदारी तो कुछ बनती नहीं।ऐसे ही विडियो तस्वीरें देखते देखते लोगों को बलात्कार जैसी बात भी मामूली लगने लगी है। लोग इसके भी विडियो बनाकर साझा करते हैं। हमारे आपके जैसे लोग पसन्द भी करते हैं।

अभय और तुषार पूरी तरह से झेंप गए क्योंकि वे अभी ऐसा ही कुछ मोबाइल पर देख रहे थे।

जाते जाते लड़कियों ने कहा-जब छोटी सी दवा की गोली बड़ी सी बीमारी ठीक कर सकती है तो हमारे छोटे क़दम भी समाज को ज़रूर बदल सकते हैं। बस हमें ये पता होना चाहिए क़दम कब और कहा उठाना है। छोटी सी गोली नैतिकता की अगर सबके ज़हन में डाल दी जाए अपने आप फिर हमारा समाज बुराइयों के कैंसर से मुक्त हो जाएगा।

इतना कह कर दोनों लड़कियाँ चली गई।अभय और तुषार पर उनकी बातों का थोड़ा असर तो ज़रूर हुआ था। उन्होंने यह तय किया कि वे किसी भी तरीक़े से मस्ती के लिए किसी की भी ग़लत तस्वीरों विडियो को कभी साझा नहीं करेंगे और जितना हो सके उसे रोकने की कोशिश ही करेंगे।

शहीद की बहादुर बेटी

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