शतरंज की अधूरी बाज़ी

नमस्कार दोस्तो,
दोस्तो ये कहानी सुधांशु जी की को 70 साल के होते हुए भी आज भी कुवारे है वो जिनसे प्यार करते थे वो किसी और से शादी कर लेती है । तो दोस्तो आज की कहानी शुरू करते है।

शतरंज की अधूरी बाज़ी

सुधांशु जी करीब सत्तर साल के बुजुर्ग पार्क की बैंच में साथ बैठे सज्जन से पूछा, "नए लगते हैं, कभी पहले देखा नहीं आपको इस इलाके में।"

"जी वैसे तो सच कहूँ तो बहुत पुराना हूँ इस शहर के लिए लेकिन परिंदा काफी सालों बाद घोंसले में वापस आया है। बस ये ही समझ लीजिए।"

सुधांशु जी, "घर लौट आए बस यही काफी है। पूरा दिन कहीं भी बिता लिया जाए लेकिन नींद तो अपने घर के ही बिस्तर में आती हैं, क्यूँ महाशय सही कह रहा हूँ न मैं।"

पत्रकार एक news reporter

"जी बिल्कुल सोलह आने सच कहा, आपने। वैसे मेरी पैदाइशी इसी शहर की है लेकिन बैंक में नौकरी थी तो हर तीन साल में तबादला होता गया और पूरा भारत भ्रमण का मौका मिला या ये कहे कहीं का नहीं रहा बस बंजारों जैसी जिंदगी जी ली, वो एक ही गली में रहना या अपने लंगोटिया यारों को साथ बड़े होते देखने का अवसर नहीं मिल पाया। और सेवानिवृत्त होने के बाद अभी दो महीने पहले ही वापस आया हूँ।"

सुधांशु, "ये भी सही है भाई, कहीं का मोह नहीं रहा आपको। वैसे आपका शुभ नाम?"

"जी, मेरा नाम सलिल है।"

सुधांशु, "आप का नाम ही ऐसा है, आपको कहाँ कोई बांध सकता है। नदी की धारा को भी कोई रोक सका है।"

बहू को सब इतना गलत क्यों समझते हैं

सलिल, "सही कहा आपने लेकिन है एक जो बांध बन कर आई जीवन में और सलिल को रोक लिया।"

सलिल ने हँसते हुए कहा, "मेरी श्रीमती जी साधना, उनकी कड़ी साधना ने जीवन में बांध का कार्य किया है। आप बताइए, आपके जीवन में कौन हैं?"

सुधांशु, "जी मैं आजाद हूँ," हँसते हुए, "मतलब समझ लीजिए कुंवारा हूँ।"

सलिल, "अच्छा अब मुझे आज्ञा दीजिए, मैडम इंतज़ार कर रही होंगी। बड़े दिलचस्प आदमी हैं आप, मिल कर बहुत अच्छा लगा।"

सास बहू का प्यार

सुधांशु, "आपसे मिल कर भी बड़ी खुशी हुई, ये सामने वाला पीला मकान मेरा है। कल समय और अपनी मैडम से आज्ञा लेकर आइयेगा तो घर ले चलूँगा आपको।"

सलिल हँसते हुए विदा लेता है, "जी बिल्कुल।"

दूसरे दिन...

सुधांशु, "स्वागत है, मेरे गरीब-खाने में।"

सलिल, "क्या बात कर रहे हैं, अमीरी तो सिर्फ दिल की होनी चाहिए है। ये कोंक्रीट में क्या रखा है। वैसे आप की ही तरह आपका घर भी बड़ा दिलचस्प है, कुछ तो ख़ास है। रहते तो आप अकेले हैं लेकिन घर का एक-एक कोना एक कहानी कह रहा है। हर जगह यादों के झरोखे से लगे हैं। ये शतरंज की अधूरी बाज़ी क्यूँ है? यहाँ ये पूरी क्यूँ नहीं की आपने? क्या अकेले ही खेल रहे थे?"

समान अधिकार

सुधांशु, "बस मैंने यादों को संजोने की कोशिश की है जिससे अकेलापन न लगे घर में। ये शतरंज की बाज़ी कई सालों से ऐसी ही इंतज़ार कर रही है जिसके साथ छोड़ा था शायद वो फिर मिल जाए तो बाज़ी पूरी हो जाए।"

सलिल, "वैसे हमारी मैडम को बड़ा शौक है शतरंज का और उनका कोई मुकाबला नहीं, हमने तो सीखने की भी कोशिश की लेकिन ये खेल हमारे समझ के परे है। आप को बुरा न लगे तो किसी दिन उनके साथ खेलिए उन्हें अच्छा लगेगा। बड़े शौक से खेलती हैं।

सुधांशु, "जी बिल्कुल स्वागत है उनका, कभी भी आ जाइए घर पर। मैंने भी कई सालों से नहीं खेला शतरंज।"

कुछ समय तक सुधांशु और सलिल का मिलने का सिलसिला यूँ ही चलता रहा और दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गए।

विदिशा एक अर्धगीनि

कुछ समय बाद सलिल, साधना को लेकर सुधांशु जी के घर पहुंचता है। सलिल फोन पर बात करने के लिए घर से बाहर जाता है और साधना चुपचाप सुधांशु जी के सामने बैठी है। तब सुधांशु जी ने चुप्पी तोड़ते हुए बोला, "सोचा नहीं था एक नाम के इतने कम लोग होते हैं दुनिया में।"

साधना, "क्या कहूँ, आज सच में लग रहा है दुनिया गोल है।"

सलिल, "अरे आप लोग बैठे क्यूँ हैं? हो जाए एक-एक बाज़ी। मुझे कुछ जरूरी काम है, मैं थोड़ी देर में आता हूँ।"

सुधांशु, "आइए, पहले ये अधूरी बाज़ी पूरी कर लीजिए जो तीस साल पहले आप अधूरी छोड़ कर चली गई थीं, आज भी वहीं रुका है खेल और शतरंज की बिसात भी वैसे ही बिछी है।"

पांखी एक बेटी की कहानी

साधना, "क्यूँ आपने शतरंज की अधूरी बिसात को वैसे ही रखा है? किसी और के साथ पूरी कर लेते बाज़ी।"

सुधांशु, "तुम्हारे सिवाय कोई और आया ही नहीं जीवन में जिसके साथ ये बाज़ी पूरी करता। वैसे सलिल जी बहुत अच्छे इंसान है।"

साधना, "जी हाँ, सलिल बहुत अच्छे हैं। अपने वादे के पक्के तो हैं, धोका तो नहीं दिया उन्होंने मुझे।"

सुधांशु, "तो क्या मैंने धोका दिया था तुम्हें। उस दिन शतरंज की बाज़ी खेलते समय तुमने मुझे बताया था मेरे लिए रिश्ता आया है शादी का और मैंने तो बस यही कहा था मुझे समय चाहिए और तुमने शतरंज की अधूरी बाज़ी की तरह मेरी बात भी अधूरी सुनी और चली गई।"

चम्पा एक बेटी की दास्तां

साधना, "क्या सुनने के लिए रुकती, छोड़ो न अब ये सारी बातों का अब क्या मतलब।"

सुधांशु, "सही कह रही हो, आगे चाल चलो अब तुम्हारी बारी है। वैसे इन खिचड़ी बालों में भी अच्छी लगती हो।"

साधना, "हँसते हुए, ये लो शह और मात।"

सुधांशु, "मुझे तो आज भी तुमसे हारना अच्छा लगता है।"

सलिल, "अरे बाज़ी पूरी हो गई, हरा दिया न हमारी मैडम ने आपको। कहा था न बहुत ही अच्छी खिलाड़ी हैं।"

बेटी हो तो ऐसी

तो दोस्तो आज की कहानी आपको कैसी लगी अच्छी लगी हो तो जरुर शेयर करे कॉमेंट करे ओर फॉलो करे।

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां