जुआ खेलने की बुरी आदत

नमस्कार दोस्तो,
दोस्तो जिंदगी में किसी  किसी को बुरी आदत जरुर होती है किसी को जुआ खेलने की तो किसी को शराब पीने की तो किसी को सिगरेट या गुटखे खाने की तो दोस्तो इस कहानी में भी एक व्यक्ति की जुआ खेलने कि आदत हो जाती है उसे बहुत समझाने पर भी वो जुआ खेलना नहीं छोड़ता है। उस जुआ छोड़ने का कहने पर वो कहता है मैने ये आदत नहीं पकड़ी बल्कि इस आदत ने मुझे पकड़ा है। तो चलिए कहानी पर आते है ओर शुरू करते है आज की हमारी कहानी।

जुआ खेलने की बुरी आदत

 एक बार की बात है . एक व्यक्ति को रोज़-रोज़ जुआ खेलने की बुरी आदत पड़ गयी थी . उसकी इस आदत से सभी बड़े परेशान रहते. लोग उसे समझाने कि भी बहुत कोशिश करते कि वो ये गन्दी आदत छोड़ दे , लेकिन वो हर किसी को एक ही जवाब देता, ” मैंने ये आदत नहीं पकड़ी, इस आदत ने मुझे पकड़ रखा है !!!”

 और सचमुच वो इस आदत को छोड़ना चाहता था , पर हज़ार कोशिशों के बावजूद वो ऐसा नहीं कर पा रहा था. परिवार वालों ने सोचा कि शायद शादी करवा देने से वो ये आदत छोड़ दे , सो उसकी शादी करा दी गयी. पर कुछ दिनों तक सब ठीक चला और फिर से वह जुआ खेलने जाना लगा.

हवस वाला प्यार

 उसकी पत्नी भी अब काफी चिंतित रहने लगी , और उसने निश्चय किया कि वह किसी न किसी तरह अपने पति की इस आदत को छुड़वा कर ही दम लेगी.

 
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एक दिन पत्नी को किसी सिद्ध साधु-महात्मा के बारे में पता चला, और वो अपने पति को लेकर उनके आश्रम पहुंची. साधु ने कहा, 

” बताओ पुत्री तुम्हारी क्या समस्या है ?” पत्नी ने दुखपूर्वक सारी बातें साधु-महाराज को बता दी . साधु-महाराज उनकी बातें सुनकर समस्या कि जड़ समझ चुके थे, और समाधान देने के लिए उन्होंने पति-पत्नी को अगले दिन आने के लिए कहा .

क्या यही प्यार है

 अगले दिन वे आश्रम पहुंचे तो उन्होंने देखा कि साधु-महाराज एक पेड़ को पकड़ के खड़े है . उन्होंने साधु से पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं ; और पेड़ को इस तरह क्यों पकडे हुए हैं ? साधु ने कहा , ” आप लोग जाइये और कल आइयेगा .” फिर तीसरे दिन भी पति-पत्नी पहुंचे तो देखा कि फिर से साधु पेड़ पकड़ के खड़े हैं .

 उन्होंने जिज्ञासा वश पूछा , ” महाराज आप ये क्या कर रहे हैं ?” साधु बोले, ” पेड़ मुझे छोड़ नहीं रहा है .आप लोग कल आना .” पति-पत्नी को साधु जी का व्यवहार कुछ विचित्र लगा , पर वे बिना कुछ कहे वापस लौट गए.

 अगल दिन जब वे फिर आये तो देखा कि साधु महाराज अभी भी उसी पेड़ को पकडे खड़े है. पति परेशान होते हुए बोला ,” बाबा आप ये क्या कर रहे हैं ?,

एक आदर्श भारतीय नारी

 आप इस पेड़ को छोड़ क्यों नहीं देते?” साधु बोले ,”मैं क्या करूँ बालक ये पेड़ मुझे छोड़ ही नहीं रहा है ?” पति हँसते हुए बोला , “महाराज आप पेड़ को पकडे हुए हैं , पेड़ आप को नहीं !….आप जब चाहें उसे छोड़ सकते हैं.” साधू-महाराज गंभीर होते हुए बोले, ” इतने दिनों से मै तुम्हे क्या समझाने कि कोशिश कर रहा हूँ 

.यही न कि तुम जुआ खेलने की आदत को पकडे हुए हो ये आदत तुम्हे नहीं पकडे हुए है!” पति को अपनी गलती का अहसास हो चुका था  , वह समझ गया कि किसी भी आदत के लिए वह खुद जिम्मेदार है ,और वह अपनी इच्छा शक्ति के बल पर जब चाहे उसे छोड़ सकता है.

स्नेहा एक किन्नर

तो दोस्तो आपको इस कहानी से ये तो पता चल ही गया होगा कि आदते कितने सालों पुरानी ही फिर भी हम चाहे तो इने छोड़ सकते है । दोस्तो मेरा तो बस इतना ही कहना है कि कभी भी गलत आदते नहीं पाले क्युकी गलत आदतों से परिवार बिखर जाता है ओर जो बित जाता है उसे हम दोबारा कभी ला नहीं सकते तो दोस्तो ये कहानी आपको कैसी लगी अच्छी लगी हो तो कॉमेंट करे शेयर करे ओर मेरे ब्लॉग को फॉलो करे जिससे कि आपको हर रोज़ नई कहानी पढ़ने को मिलेगी । धन्यवाद

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