समान अधिकार

नमस्कार दोस्तो,
ये कहानी एक ऐसे इंसान की है ।  जिसके उप्पर शुरू से कोई दबाव नहीं होता है इसलिए  बड़ा होते होते गलत रास्ते पर चला जाता है ओर  एक दिन एक नाबालिग लड़की का बलात्कार कर देता है और उसका फांसी सजा हो जाती है।

समान अधिकार

अदालत के कटघरे में खड़े हुए रोहित सिर झुका कर सबकी बातें सुनते रहता है और जज साहब कहते हैं कि दो दिन बाद सुबह तुम्हें फांसी दे दी जाएगी। अगर तुम्हारी कुछ आखिरी इच्छा है तो बोल दो, रोहित कहता है कि मैं चाहता हूं कि मेरे सामने मीडिया हो मैं अपनी बात सभी तक पहुंचाना चाहता हूं, ताकि सब लोग मेरी बात सुने सकें और उसे इजाजत मिल जाती है।

दूसरे दिन मीडिया को बुलाया जाता है और फिर रोहित कहता है कि कुछ बातें हैं जो मैं लोगों से कहना चाहता हूं, मैं चाहता हूं यह बातें हर माता-पिता और बच्चों तक पहुंचे।

विदिशा एक अर्धगीनी

मेरे परिवार में कुल चार लोग थे, मैं मेरी एक छोटी बहन और माता पिता। हमारी परवरिश आम बच्चों के जैसे हुयी हैं जहां परिवार में लड़का पैदा हुआ तो बहुत ही जिम्मेदार माना जाता है। मैं 4 साल का था और मेरी बहन 5 साल की थी पर अक्सर मुझे यह महसूस कराया जाता था कि वह कमजोर है और मैं ताकतवर। जब भी कहीं दुकान पर जाना होता तो मेरी बहन को अकेले नहीं भेजते थे पर मुझे अकेले भेज दिया जाता था इससे मुझे लगता था कि मेरी बहन एक कमजोर है क्योंकि वो एक लड़की हैं।

बड़े होने के बाद भी उसे कहीं जाना होता तो उसके कपड़ों पर अक्सर बहुत ध्यान दिया जाता था जैसे कि कपड़े छोटे ना हो, दुपट्टा लिया है या नहीं इत्यादि।

इसलिए मुझे लगता था कि लड़कियों को इस तरह के कपड़े नहीं पहनने चाहिए क्योंकि मेरी मां कहती थी कि लड़कियों का चरित्र उनके कपड़ों से जुड़ा होता है।

पांखी एक बेटी की कहानी

मैं जब अठारह वर्ष का हुआ तो अपने आसपास लड़कियों को घूरता और लड़कियों को छेड़ता तो लोग यह कहकर चले जाते थे कि यह तो बिगड़ा हुआ है।

स्कूल में अक्सर मुझे आखरी बेंच पर बैठाया जाता था क्योंकि शिक्षक मुझे पसंद नहीं करते थे।

घर पर आता तो पापा मुझे अक्सर डाटते थे और कहते थे लड़का हाथ से निकल गया है। बस इन्हीं माहौल में मै पला बड़ा था और जब मैं बड़ा हुआ तो मुझे लगता था कि मैं सही हूं।

 मैंने कभी खुद को गलत समझा ही नहीं, मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि मैं जो कर रहा हूं वह गलत है। छोटी छोटी गलतियां करते करते मैंने एक बहुत बड़ा जुल्म कर डाला जिसकी इस दुनिया में कोई माफी नहीं है और उस जुर्म का नाम है बलात्कार! हां, मैंने एक नाबालिग लड़की का बलात्कार किया हैं।

चम्पा एक बेटी की दास्तां

 पता नहीं कैसे मैं इस रास्ते पर चल पड़ा, जब मैं उम्र के साथ बड़ा हुआ तो मेरे अंदर लड़कियों के प्रति एक अलग सी चाहत बढ़ने लगी। मैं अक्सर मोबाइल पर सेक्स के गंदे गंदे वीडियो देखने लगा था, वीडियो को देखकर एक अलग सी उत्तेजना शरीर में होती थी।

 एक दिन उत्तेजित होकर मैने, मेरे पड़ोस की 15 साल की लड़की रूहानी को बहला-फुसलाकर अपने साथ एक खंडहर में ले गया और उसे जबरदस्ती उसका बलात्कार कर डाला। मैंने जो किया है उसकी सजा मुझे मिल चुकी है जो कि फांसी है और ज्ञआप सभी को पता है।

मैं आज सब कुछ इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मुझे अब यह एहसास हुआ है कि मैंने बहुत बड़ा पाप किया है, अगर मुझे एहसास पहले होता तो ऐसा ना होता।

बेटी हो तो ऐसी

कहीं ना कहीं इसके जिम्मेदार आप सभी हैं, ये पूरा समाज हैं।

सोचिये,

1) अगर मेरी मां ने मेरी बहन को उसके कपड़ों पर ना टोका होता तो अच्छा होता। मेरी मां ने मुझे कम उम्र में ताकतवर ना बनाया होता तो अच्छा होता। अगर उन्होंने लड़के और लड़की को एक समान अधिकार या हक जताया होता तो अच्छा होता।

2) मेरी टीचर ने मुझे आखिरी बेंच पर बैठाने से पहले अगर मुझे मेरी गलतियां बताई होती तो अच्छा होता।

3) जब मैं पहली बार एक लड़की को छेड़ रहा था तो लोगों ने कहा कि बिगड़ा हुआ है और हाथ से निकल गया है अगर उन्होंने मुझे उस वक्त रोका होता कि बेटा ऐसा करना सही नहीं है। मुझे सही और गलत का फर्क बताया होता तो अच्छा होता।

4) लड़कियों का कपड़ा छोटा होना और चरित्रहीन होना एक है अगर मुझे इसमें फर्क बताया गया होता तो अच्छा होता।

पापा की नन्ही परी

ये सारी छोटी छोटी बातें मुझे अगर उम्र रहते समझाया गया होता तो अच्छा होता।

मेरी हर माता-पिता से विनती है कि आप अपने बच्चों को समान अधिकार दे, लड़कियों को उनके कपड़ों से ना तोले। बच्चों को बताओ क्या सही है और क्या गलत।

उम्र के चलते लड़कों में और लड़कियों में दोनों में कुछ बदलाव होता है चाहे वह आंतरिक हो या शारीरिक पर बदलाव हर किसी में होता है। उन्हें सेक्स एजुकेशन देना भी बहुत जरूरी है क्योंकि बच्चों को जब उस चीज के बारे में जानकारी होगी तो वैसा ही बर्ताव करेंगे। उम्र के इस मोड़ पर उन्हें सही जानकारी होना या एक जानकारी देने वाले की जरूरत है।

स्नेहा एक किन्नर

मैं नहीं चाहता कि मैं आज जिस मोड़ पर हूं उस पर कोई और हो, मैं चाहता हूं मेरी सजा लोगों के लिए एक सबक हो। मुझे खुशी है कि मुझे फांसी दी गई है क्योंकि यह मेरे गुनाहों का प्रायश्चित होगा। बस इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कहना चाहता, यह कहकर रोहित वहां से चला जाता है और दूसरे दिन सुबह उसे फांसी दे दी जाती है।

देखा जाए तो रोहित ने बहुत बड़ी बात कही है कि बच्चों की परवरिश ही उन्हें सही रास्ता दिखाती है फिर वह लड़का हो या लड़की। माँ-बाप होने के नाते हमारा फर्ज है कि हम उन्हें देश का अच्छा नागरिक बनाएं जिनपर सभी को गर्व हो। याद रखें बच्चे पैदा तो सभी करते हैं पर परवरिश सिर्फ कुछ माँ-बाप ही कर पाते हैं।

तो दोस्तो आज  कहानी आपको कैसी लगी अगर पसंद आएगी लाइक कॉमेंट शेयर जरुर करे ओर सब्सक्राइब करना ना भूले।

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